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# बहन के साथ मज़ा # - fuckstories



# बहन के साथ मज़ा #
मेरा नाम अमित है और मै 20 साल का हूँ मेरी दीदी का नाम संगीता है और उसकी उमर क़रीब 26 साल है दीदी मुझसे 6 साल बारी हैं हमलोग एक छोटे से फ़्लत मे मुंबई मे रहते हैं

हमारा घर मे एक छोटा सा हलल, दिनिंग रूम दो बेडरोम और एक कित्चें है बाथरूम एक ही था और उसको सभी लोग इस्तेमल करते थे. हमरे पिता और मा दोनो नौकरी करते हैं दीदी मुझको अमित कह कर पुकारती हैं और मै उनको दीदी कहा कर पुकाता हूँ. शुरू शुरू मे मुझे सेक्श के बारे कुछ नही मालूम था क्योंकि मै हिघ सचूल मे पर्हता था और हमरे बुल्डिंग मे भी अच्छी मेरे उमर की कोई लार्की नही थी. इसलिए मैने अभी तक सेक्श का मज़ा नही लिया था और ना ही मैने बटक कोई नंगी लार्की देखी थी. हाँ मै कभो कभी प्रोनो मागज़ीने मे नंगी तसबीर देख ल

मुझे अभी तक याद है की मैई अपना पहला मूट मेरी दीदी के लिए ही मारा था. एक सुंदय सुबह सुबह जैसे ही मेरी दीदी बाथरूम से निकली मैई बाथरूम मे घुस गया. मई बाथरूम का दरवाज़ा बंद किया और अपने कपरे खोलना शुरू किया. मुझे जोरो की पिशाब लगी थी. पिशाब करने के बाद मैई अपने लंड से खेलने लगा. एका एक मेरी नज़र बाथरूम के किनारे दीदी के उतरे हुए कपरे पर परा. वँह पर दीदी पानी निघतगोवँ उतर कर चोर गयी थी. जैसे ही मैने दीदी की निघतगोवँ उठाया तो देखा की निघतगोवँ के नीचे दीदी की ब्लक्क ब्रा परा हुआ था. जैसे ही मैई दीदी का काले रंग का ब्रा उठाया तो मेरा लंड अपने आप कहरा होने लगा. मई दीदी के निघतगोवँ उठाया तो उसमे से दीदी के नीले रंग का पंतय भी गिर कर नीचे गिर गया. मैने पंतय भी उठा लिया. अब मेरे एक हाथ मे दीदी की पंतय थी और दूसरे हाथ मे दीदी के ब्रा था.

ओह भगवान दीदी के अंडेरवाले कपरे चूमे से ही कितना मज़ा आ रहा है एह वोही ब्रा हैं जो की कुछ देर पहले दीदी के चुनचेओं को जाकर रखा था और एह वोही पंतय हैं जो की कुछ देर पहले तक दीदी की छूट से लिपटा था. एह सोच सोच करके मैई हैरान हो रहा था और अंदर ही अंदर गरमा रहा था. मई सोच नही प र्ह था की मैई दीदी के ब्रा और पंतय को लेकर्के क्या करूँ. मई दीदी की ब्रा और पंतय को लेकर्के हैर तरफ़ से छुआ, सूंघा, चटा और पता नही क्या क्या किया. मई उन कपरों को अपने लंड पर माला. ब्रा को अपने छाती पर रखा. मई अपने खरे लंड के ऊपेर दीदी की पंतय को पहना और वो लंड के ऊपेर ताना हुआ था. फिर बाद मे मैं दीदी की निघतगोवँ को बाथरूम के देवर के पास एक हंगेर पर तंग दिया. फिर कपरे तंगने वाला पीन लेकर्के ब्रा को निघतगोवँ के ऊपेरी भाग मे फँसा दिया और पंतय को निघतगोवँ के कमर के पास फँसा दिया. अब ऐसा लग रहा था की दीदी बाथरूम मे देवर के सहारे ख़री हैं और मुझे अपनी ब्रा और पंतय दिख रही हैं मई झट जा कर दीदी के निघतगोवँ से छिपक गया और उनकी ब्रा को चूसने लगा और मान ही मान सोचने लगा की मैं दीदी की चुनची चुस रहा हूँ. मई अपना लंड को दीदी के पंतय पास रगारने लगा और सोचने लगा की मैई दीदी को छोड़ रहा हूँ. मई इतना गरम हो गया था की मेरा लंड फूल कर पूरा का पूरा टनना गया था और थॉरी देर के बाद मेरे लंड ने पानी चोर दिया और मैई झार गया. मेरे लंड ने पहली बार अपना पानी चोरा था और मेरे पानी से दीदी की पंतय और निघतगोवँ भीग गया था. मुझे पता नही की मेरे लंड ने कितना वीरज़ निकाला था लेकिन जो कुछ निकला था वो मेरे दीदी के नाम पर निकला था.

मेरा पहले पहले बार झरना इतना तेज़ था की मेरे पैर जवाब दे दिया और मैई पैरों पर ख़रा नही हो प रहा था और मैई चुप छाप बाथरूम के फ़र्श पर बैठ गया. थॉरी देर के बाद मुझे होश आया और मैई उठ कर नहाने लगा. शोवेर के नीचे नहा कर मुझे कुछ ताज़गी महसूस हुआ और मैई फ़्रेश हो गया. नहाने बाद मैई देवर से दीदी की निघतगोवँ, ब्रा और पंतय उतरा और उसमेसे अपना वीरज़ धो कर साफ़ किया और नीचे रख दिया. उस दिन के बाद से मेरा एह मूट मरने का तरीक़ा मेरा सुब्से फावरीटे हो गया. हाँ, मुझे इस तरह से मूट मरने का मौक़ा सिर्फ़ इटवार इटवार को ही मिलता था. क्योंकि, इटवार के दिन ही मैई दीदी के नहाने बाद नहाता था. इटवार के दिन चुप छाप अपने बिस्टेर परा परा देखा करता था की कब दीदी बाथरूम मे घुसे और दीदी के बाथरूम मे घुसते ही मैई उठ जया करता था और जब दीदी बाथरूम से निकलती तो मैई बाथरूम मे घुस जया करता था. मेरे मा और पिताजी सुबह सुबह उठ जया करते थे और जब मैई उठता था तो मा रसोई के नाश्ता बनती होती और पिताजी बाहर बलकॉनय मे बैठ कर अख़बार पर्हते होते या बाज़ार गाये होते कुछ ना कुछ समान ख़रीदने. इटवार को चोर कर मैई जब भी मूट मरता तो तब एही सोचता की मैई अपना लंड दीदी की रस भारी छूट मे पेल रहा हूँ. शुरू शुरू मे मैई एह सोचता था की दीदी जब नंगी होंगी तो कैसा दिखेंगी? फिर मैई एह सोचने लगा की दीदी की छूट छोड़ने मे कैसा लगेगा. मई कभी कभी सपने ने दीदी को नंगी करके छोड़ता था और जब मेरी आँख खुलती तो मेरा शॉर्ट भीगा हुआ होता था. मैने कभी भी अपना सोच और अपना सपने के बारे मे किसी को भी नही बताया था और दीदी को भी इसके बारे मे जानने दिया.

मई अपनी सचूल की पर्हई ख़तम करके कॉल्लेगे जाने लगा. कॉल्लेगे मेरे कुछ गिरल फ़रिएंड भी हो गाये उन गिरल फ़रिएंड मे से माने दो चार के साथ सेक्श का मज़ा भी लिया. मई जब कोई गिरल फ़रिएंड के साथ छुड़ाई करता तो मैई उसको अपने दीदी के साथ कोंपरे करता और मुझे कोई भी गिरल फ़रिएंड दीदी के बराबर नही लगती. मई बार बार एह कोशिश करता था मेरा दिमाग़ दीदी पर से हट जाए, लेकिन मेरा दिमाग़ घूम फिर कर दीदी पर ही आ जाता. मई हूमेशा 24 घंटे दीदी के बारे मे और उसको छोड़ने के बारे मे ही सोचता रहता. मी जब भी घर पर होता तो दीदी तो ही देखता रहता, लेकिन इसकी जानकारी दीदी की नही थी. दीदी जब भी अपने कपरे बदलती थी या मा के साथ घर के काम मे हाथ बताती थी तो मैई चुपके चुपके उन्हे देखा करता था और कभी कभी मुझे सूदोल चुची देखने को मिल जाती (ब्लौसे के ऊपेर से) थी. दीदी के साथ अपने छोटे से घर मे रहने से मुझे कभी कभी बहुत फ़ैदा हुआ करता था. कभी मेरा हाथ उनके शरेर से टकरा जाता था. मई दीदी के दो भरे भरे चुनची और गोल गोल छूटारों को चुने के लिए मारा जा रहा था.

मेरा सुब्से अच्छा पासस टीमे था अपने बलकॉनय मे खरे हो कर सरक पर देखना और जब दीदी पास होती तो धीरे धीरे उनकी चुनचेओं को चुना. हुमरे घर की बलकॉनय कुछ ऐसी थी की उसका लुंबाई घर के सामने गली के बराबर मे था और उसकी सकरी सी चौराई के सहारे खरे हो कर हम सरक देख सकते थे. हुमरे बलकॉनय की चौराई इतनी थी के दो आदमी एक साथ सात के खरे हो कर सरक को देख सके. मई जब भी बलकॉनय पर खरे होकर सरक को देखता तो अपने हाथों को अपने सीने पर मोर कर बलकॉनय के रेल्लिंग के सहारे ख़रा रहता था. कभी कभी दीदी आती तो मैई तोरा हट कर दीदी के लिए जगह बना देता और दीदी आकर अपने बगल ख़री हो जाती. मई ऐसे घूम कर ख़रा होता की दीदी को जाती.बिल्कुल---!!---बिलकुल सात कर ख़रा होना पर्टा. दीदी की भारी भारी चुनची मेरे सीने से सात जाता था. मेरे हाथों की उंगलियाँ, जो की बलकॉनय के रेल्लिंग के सहारे रहती वे दीदी के चुनचेओं से छु जाती थी. मई अपने उंगलियों को धीरे धीरे दीदी की चुनचेओं पर हल्के हल्के चलत था और दीदी को एह बात नही मालूम था. मई उंगलीओं से दीदी की चुनची को छू कर देखा की उनकी चुनची कितना नरम और मुआयम है लेकिन फिर भी तनी तनी रहा करती हैं कभी कभी मैई दीदी के छूटारों को भी धीरे धीरे अपने हाथों से छूटा था. मई हूमेशा ही दीदी की सेक्ष्य शरेर को इसी तरह से छूटा था.

मई समझता था की दीदी मेरे हाक्तों और मेरे इरादो से अनजान हैं दीदी इस बात का पता भी नही था की उनका छोटा भाई उनके नंगे शरीर को चाहता है और उनकी नंगी शरेर से खेलना चाहता है लेकिन मैई ग़लत था. फिर एक दीदी ने मुझे पाकर लिया. उस दिन दीदी कित्चें मे जा करा अपने कपरे छाई कर रही थी. हलल और कित्चें के बीतच का पर्दा तोरा खुला हुआ था. दीदी दूसरी तरफ़ देख रही थी और अपनी कुर्ता उतर रही थी और उसकी ब्रा मे चुपा हुआ चुनची मेरे नज़रों के सामने था. फ़र रोज़ के तरह मैई त.व. देख रहा था और दीदी को भी कंखिओं से देख रहा था. दीदी ने तब एकाएक सामने वाले दीवार पर तँगा मीर्रोर को देखी और मुझे आँखे पहर फ़र कर घुरते हुए पाई. दीदी ने देखा की मैई उनकी चुनचेओं को घूर रहा हूँ. फिर एकाएक मेरे और दीदी की आँखे मिरूर मे टकरा गयी मई शर्मा गया और अपने आँखे त.व. तरफ़ कर लिया. मेरा दिल क्याधारक रहा था. मई समझ गया की दीदी जान गयी हैं की मैई उनकी चुनचेओं को घूर रहा था. अब दीदी क्या करेंगी? क्या दीदी मा और पिताजी को बता देंगी? क्या दीदी मुझसे नाराज़ होंगी? इसी तरह से हज़ारों प्रश्ना मेरे दिमाग़ मे घूम रहा था. मई दीदी के तरफ़ फिर से देखने का साहस जुटा नही पाया. उस दिन सारा दिन और उसके बाद 2-3 दीनो तक मैई दीदी से दूर रहा, उनके तरफ़ नही देखा. इन 2-3 दीनो मे कुछ नही हुआ. मई ख़ुश हो गया और दीदी को फिर से घुरना चालू कर दिया. दीदी मे मुझे 2-3 बार फिर घुरते हुए पाकर लिया, लेकिन फिर भी कुछ नही बोली. मई समझ गया की दीदी को मालूम हो चुक्का है मैई क्या चाहता हूँ और वो हुमए कुछ नही बोलेंगी. दीदी हुँसे इस बारे मे कोई नही बात की और ना ही किसीसे कुछ बोली. एह मेरे लिए बहुत अस्चर्या की बात थी. ख़ैर जब तक दीदी को कोई एतराज़ नही तो मौझे क्या लेना देना और बारे मज़े से दीदी घुरने लगा.

एक दिन मैई और दीदी अपने घर के बलकॉनय मे पहले जैसे खरे थे. दीदी मेरे हाथों से सात कर ख़री थी और मैई अपने उंगलीओं को दीदी के चुनची पर हल्के हल्के चला रहा था. मुझे लगा की दीदी को शायद एह बात नही मालूम की मैई उनकी चुनचेओं पर अपनी उंगलीओं को चला रहा हूँ. मुझे इस लिए लगा क्योंकी दीदी मुझसे फिर भी सात कर ख़री थी. लेकिन मैई एह तो समझ रहा थी क्योंकी दीदी ने पहले भी नही टोका था, तो अब भी कुछ नही बोलेंगी और मैई आराम से दीदी की चुनचेओं को छू सकता हूँ. हूमलोग अपने बलकॉनय मे खरे थे और आपस मे बातें कर रहे थे, हूमलोग कॉल्लेगे और स्पोर्ट्स के बारे मे बाते कर रहे थे. चुनकी हुमारा बलकॉनय के सामने एक गली था तो हूमलोगों की बलकॉनय मे कुछ अंधेरा था.

बाते करते करते दीदी मेरे उंगलीओं को, जो उनकी चुनची पर घूम रहा था, अपने हाथों से पाकर कर अपने चुनची से हटा दिया. दीदी को अपने चुनची पर मेरे उंगली का एहसास हो गया था और वो थॉरी देर के लिए बात करना बंद कर दिया और उनकी शरेर कुछ आकर गयी लेकिन, दीदी अपने जगह से हिली नही और मेरे हाथो से सात कर ख़री रही. दीदी ने मुझे से कुछ नही बोली तो मेरा होम्मात बार्ह गया और मैई अपना पूरा का पूरा पाँजा दीदी की एक मुलायम और गोल गोल चुनची पर रख दिया. मई बहुत दर रहा था. पता नही दीदी क्या बोलेंगी? मेरा पूरा का पूरा शरेर कांप रहा था. लेकिन दीदी कुछ नही बोली. दीदी सिर्ह एक बार मुझे देखी और फिर से सरक पर देखने लगी. मई भी दीदी की तरफ़ दर के मारे नही देख रहा था. मई भी सरक पर एख रहा था और अपना हाथ से दीदी की एक चुनची को धीरे धीरे सहला रहा था. मई पहले धीरे धीरे दीदी की एक चुनची को सहला रहा था और फिर थॉरी देर के बाद दीदी की एक मुलायम गोल गोल, नरम लेकिन तनी चुनची को अपने हाथ से ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा. दीदी की चुनची काफ़ी बारी थे और मेरे पनजे मे नही समा रही थी. मुझे पहले दीदी की चुनची को नीचे पकरना पर रहा था और धीरे धीरे मैई अपने हाथ को ऊपेर ले जा रहा था. थॉरी देर बाद मुझे दीदी की कुर्ता और ब्रा के ऊपेर से लगा की चुनची के निपपले तन गयी और मैई समझ गया की मेरे चुनची मसलने से दीदी गरमा गयी हैं दीदी की कुर्ता और ब्रा के कपरे बहुत ही महीन और मुलायम थी और उनके ऊपेर से मुझे दीदी की निपपले टनने के बाद एक छोटा सा रुबबेर जैसा लग रहा था. ओह भागबाँ! मई तो जाती स्वारग मे था, दीदी की चुनची चुने से मुझे जैसे स्वर्ग मिल गया था. किसी जवान लार्की के चुनची चुने का मेरा एह पहला अब्सर था. मुझे पता ही नही चला की मैई कब तक दीदी की चुनचेओ को मसलाटा रहा. और दीदी ने भी मुझे एक बार के लिए माना नही किया. दीदी चुपचाप ख़री हो कर मुझसे अपना चुनची मिज़वटी रही. दीदी की चुनची मसलते मसलते मेरा लंड धीरे धीरे ख़रा होने लगा था. मुझे बहुत मज़ा आ रहा था और मैई एह सोच सोच कर और भी मज़ा ले रहा था की मेरी बारी दीदी चुपचाप ख़री रहा कर मुझसे अपनी चुनची मसलवा रही थी. मई तो और पता नही कब तक दीदी की चुनची को मसलता लेकिन एकाएक मा की आवाज़ सुनाई दी. मा की आवाज़ सुनते ही दीदी ने धीरे से मेरा हाथ अपने चुनची से हटा दिया और मा के पास चली गयी उस रत मैई सो नही पाया, मैई सारी रत दीदी की मुलायम मुलायम चुनची के बारे मे सोचता रहा.

दूसरे दिन शाम को मैई रोज़ की तरह अपने बलकॉनय मे खरा हो कर सरक की तरफ़ देख रहा था. थॉरी देर के बाद दीदी बलकॉनय मे आओउई और मेरे बगल मे दूर ख़री हो गयी मई 2-3 मुनुते तक चुपचाप ख़रा रहा और दीदी की तरफ़ देखता रहा. दीदी ने मेरे तरफ़ देखी. मई धीरे से मुस्कुरा दिया, लेकिन दीदी नही मुस्कुरई और चुपचाप सरक पर देखने लगी. मई दीदी से धीरे से बोला, और पास आ दीदी ने हुँसे पूछी. चुना चटा मैई साफ़ साफ़ दीदी से कुछ नही कह पा रहा था. चुना चाहते हो? साफ़ साफ़ दीदी ने फिर मुझसे पूछी. तब मैई धीरे से दीदी से बोला, तुम्हारी डॉडध चुना दीदी ने तब मुझसे तपाक से बोली, क्या चुना है साफ़ साफ़ मई तब दीदी से मुस्कुरा कर बोला, तुम्हारी चुनची चुना है उनको मसलना अभी मा आ सकती दीदी ने तब मुस्कुरा कर बोली. मई भी तब मुस्कुरा कर अपनी दीदी से बोला, भी मा आएगी हूमलोगों को पता चल मेरे बातों को सुन कर दीदी कुछ नही बोली और चुपचाप ख़री रही. तब मैयाने फिरे से दीदी से बोला, दीदी और नज़दीक आ

तब दीदी मेरे और पास आ कर ख़री हो गयी दीदी मेरे जाती पास ख़री थी, लेकिन उनकी चुनची कल की तरह मेरे हाथों से नही छू रहा था. मई समझ गया की दीदी आज मेरे से सात कर ख़री होने से कुछ शर्मा रही है अबतक दीदी अनजाने मे मुझसे सात कर ख़री होती थी. लेकिन आज जान बुझ कर मुझसे सात कर ख़री होने से वो शर्मा रही है क्योंकी आज दीदी को मालूम था की सात कर ख़री होने से क्या होगा. जैसे दीदी पास आ गयी और अपने हाथों से दीदी को और पास खीच लिया. अब दीदी की चुनची मेरे हाथों को कल की तरह छू रही थी. मई क़रीब पाँच मिनुत तक इंतेज़ार किया औ फिर अपना हाथ दीदी की चुनची पर टीका दिया. दीदी के चुनची चुने के साथ ही मैई मानो स्वर्ग पर पहुँच गया. मई दीदी की चुनची को पहले धीरे धीरे छुआ, फिर उन्हे कस कस कर मिन्ज़ा और मसला. कल की तरह, आज भी दीदी का कुर्ता और उसके नीचे ब्रा बहुत महीन कपरे का था, और उनमे से मुझे दीदी की निपपले तन कर खरे होना मालूम चल रहा था. मई तब अपने एक उंगली और औंगूते से दीदी की निपपले को ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. मई जतने बार दीदी की निपपले को दबा रहा था, उतने बार दीदी कसमसा रही थी और दीदी का मुँह शरम के मारे लाल हो रहा था. तब दीदी ने मुझसे धीरे से बोली, धीरे दबा, लगता मई तब दीदी की चुनची मीज़ई तोरा धीरे धीरे करने लगा.

मई और दीदी ऐसे ही फालट्ू बातें कर रहे थे और देखने वाले को एही दिखता की मैई और दीदी कुछ गंभीर बातों पर बहस कर रहे रथे. लेकिन असल मे मैई दीदी की चुनचेओं को अपने हाथों से कभी धीरे धीरे और कभी ज़ोर ज़ोर से मसल रहा था. थॉरी देर मा ने दीदी को बुला लिया और दीदी चली गयी ऐसे ही 2-3 दिन तक चलता रहा. मई रोज़ दीदी की चुनचेओं को अपने एक हट से मिनज़्त रहा और दीदी भी रोज़ शाम को मेरे बगल मे ख़री हो कर मुझसे अपनी चुनची मिनज़वती रही. लेकिन एक समस्या थी मैई एक वक़्त पर दीदी की सिर्फ़ एक चुनची को मसल पता था. मतल्ब जब दीदी मेरे बाई तरफ़ ख़री होते तो मैई दीदी की दाईन चुनची मसलता और जब दीदी मेरे दाईन तरह ख़री होती तो मैई दीदी की बाईं चुनची को दबा पता. लेकिन असल मे मैई दीदी को दोनो चुनचेओं को अपने दोनो हाथों से पाकर कर मसलना चाहता था. लेकिन बलकॉनय मे खरे हो कर एह मुमकिन नही था. मई दो दिन तक इसके बारे मे सोचता रहा.

एक दिन शाम को मैई हलल मे बैठ कर त.व. देख रहा था. मा और दीदी कित्चें मे दिननेर की टायरी कर रही थी. कुछ देर के बाद दीदी ने पाना काम ख़तम करके हलल मे आ गयी मई हलल मे बिस्टेर पर बैठा था और मेरा पीठ दीवार के सहारे था और पैर फैले हुए थे. दीदी कित्चें से आ कर बिस्टेर पर बैठ गयी दीदी ने थॉरी देर तक त.व. देखी और फिर अख़बार उठा कर पर्ने लगी. थॉरी देर तक अख़बार के फ़्रोंट पगे के नेवस पर्ने के बाद दीदी ने अख़बार खोल करके अंदर वाले पगे के नेवस पर्ने लगी. दीदी बिस्टेर पर पालटी मार कर बैठी थी और अख़बार अपने सामने उठा कर पार् रही थी. मेरा पैर दीदी को छू रहा था. मैने अपना पैरों को और तोरा सा आगे खिसका दिया और और अब मेरा पैर दीदी की जंघो को छू रहा था. मा कित्चें मे काम कर रही थी और मैई उनको देख रहा था. मई दीदी की पीठ को देख रहा था. दीदी आज एक काले रंग का त-शिर्त पहने हुई थी और उस त-शिर्त का बहुत ही झिना था. त-शिर्त के ऊपेर से मुझे दीदी की काले रंग का ब्रा भी दिख रहा था. मुझे दीदी सेक्ष्य पीठ और काले रंग वाला ब्रा देख कर गरमा गया और मेरे दिमाग़ मे कुछ सुझा.

मई धीरे से अपना एक हाथ दीदी की पीठ पर रखा और त-शिर्त के ऊपेर से दीदी की पीठ पर चलाने लगा. जैसे माएरा हाथ दीदी की पीठ को छुआ दीदी की शरीर आकर गया. दीदी ने तब दबी जवान से मुझसे पूछी, एह तुम क्या कर रहे नही, बस मैई तुम्हारे पीठ पर आपण हाथ रगर रहा मैने दीदी से बोला. "तुम पागल तो नही हो गाये मा अभी हम दोनो तो कित्चें से देख लेगी", दीदी ने दबी जवान से फिर मुझसे बोली. "मा कैसे देख लेगी?" मैने दीदी से कहा. "क्या मतलब है तुम्हारा? दीदी ने हुँसे पूछी. "मेरा मतलब एह है की तुम्हारे सामने अख़बार खुली हुईए है अगर मा हुमरे तरफ़ देखेगी तो उनको अख़बार दिखलाई देगी." मैने दीदी से धीरे से कहा. "तू बहुत स्नर्ट और शैतान है दीदी ने धीरे से मुझसे बोली.

फिर दीदी चुप हो गयी और अपने सामने अख़बार को फैला कर अख़बार पर्ने लगी. मई भी चुपचाप अपना हाथ दीदी के चिक्नी पीठ पर घूमने लगा. मई कभी कभी अपने उँगलेओं से दीदी की ब्रा को उनके त-शिर्त के ऊपेर से छू रहा था. कुछ समय के बाद मैई अपना जात दीदी के दाहिने बगल के तरफ़ बरहा दिया और हाथ फेरने लगा. मई दीदी के दाहिने बगल के पास अपना हाथ 2-3 बार ऊपेर नीचे किया और फिर तोरा सा झुक कर मैई अपना हाथ दीदी की दाहिने चुनची पर रख दिया. जैसे ही मैई अपना हाथ दीदी के दाहिने चुनची पर रखा दीदी थॉरी सी कांप गयी मई भी तब इत्मिनान से दीदी की दाहिने वाली चुनची अपने हाथ से मसलने लगा. थॉरी देर दाहिना चुनची मसलने के बाद मैई अपना दूसरा हाथ से दीदी बाईं तरफ़ वाली चुनची पाकर लिया और दोनो हाथों से दीदी की दोनो चुनचेओं को एक साथ मसलने लगा. दीदी कुछ नही बोली और वो चुप छाप अपने सामने अख़बार फैलाए अख़बार परहती रही. मेरा साहस कुछ बार्ह गया और तोरा सा सामने खिसक कर दीदी की त-शिर्त को पीछे से उठाने लगा. दीदी की त-शिर्त दीदी के छूटारों के नीचे दबी थी और इसलिए वो ऊपेर नही उठ रही थी. मई तोरा सा ज़ोर लगाया लेकिन कोई फ़ैदा नही हुआ. तब मैने धीरे से दीदी से कहा, दीदी, तोरा

दीदी को मेरे दिमाग़ की बात पता चल गया. दीदी थॉरी सी झुक कर के अपना छूतर को उठा दिया और मैने उनका त-शिर्त धीरे से उठा दिया. अब मैई फिर से दीदी के पीठ पर अपना ऊपेर नीचे घूमना शुरू कर दिया और फिर अपना हाथ त-शिर्त के अंदर कर दिया. वो! क्या चिकना पीठ था दीदी का. मई धीरे धीरे दीदी की पीठ पर से उनका त-शिर्त पूरा का पूरा उठ दिया और दीदी की पीठ पूरा की पूरा नागी कर दिया. अब मुझे दीदी की चुनचेओं का कुछ कुछ हिस्सा उनके काले ब्रा के ऊपेर से दिख रहा था. तेरे.

मई अब अपने हाथ को दीदी की पीठ पर ब्रा के ऊपेर घूमना शुरू किया. जैसे ही मैने ब्रा को छुआ दीदी कांपने लगी. फिर मैई धीरे से अपने हाथ को ब्रा के सहारे सहारे बगल के नीचे से आगे की तरफ़ बरहा दिया. फिर मैई दीदी की ब्रा से दाख़ी दोनो चुनचेओं को अपने हाथ मे पाकर लिया और ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. दीदी की निपपले इस समय तनी तनी थी और मुझे उसे अपने उँगलेओं से दबाने मे मज़ा आ रहा था. मई तब आराम से दीदी की दोनो चुनचेओं को अपने हाथों से दबाने लगा और कभी कभी निपपले को अपने उनगेओं से पाकर कर खिचने लगा.

मा अभी भी कित्चें मे खाना पका रही थी. हूमलोगों को मा साफ़ साफ़ कित्चें मे काम करते दिखलाई दे रही थी. मा कभी कभी हुमरे तरफ़ देख लेती और उनको दीदी का अख़बार परना दिखलैईई दे रहा था. उनको एह समझ मे ही आ रहा था की कमरे मे मैई दीदी की चुनचेओं को दबा दबा कर सूच ले रहा हूँ और दीदी चिंची मसलवा मसलवा कर सूच ले रही है मई एह सोच सोच कर कुश हो रहा की दीदी कैसे मुझे अपनी चुनचेओं से खेलने दे रही है और वो भी तब जब मा घर मे मौजूद हैं

मई ऐसे सुनहरा अब्सर खोना नही चाहता था. मई तब अपना एक हाथ फिर से दीदी के पीठ पर ब्रा के हूक तक ले आया और धीरे धीरे दीदी की ब्रा की हूक को खोलने लगा. दीदी की ब्रा बहुत तिघ्ट थी और इसलिए ब्रा का हूक आसानी से नही खुल रहा था. लेकिन जब तक दीदी को एह पता चलता मैई उनकी ब्रा की हूक खोल रहा हूँ, ब्रा की हूक खुल गया और ब्रा ...


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