These are the excerpts of Shankarji's interview on Doordarshan wherein he spoke about the reason behind the success of S-J songs. If anybody has problem in viewing devanagari fonts here, please have patience; full transcript will be posted on blogspot very soon.
तबस्सुम: किसी भी गाने की पहली चीज़ सिचुएशन, उसके बाद बोल और तीसरा नम्बर आता है धुन का -लोगों का ये खयाल है, आप इससे कहां तक सहमत हैं?
शंकर: ऐसा है कि हम लोग जो करते हैं, पहले धुन बनाते हैं. शुरु से ही धुन बनाते हैं.
तबस्सुम: यानि हमने जिस चीज़ को तीसरी चीज़ कहा, वो आपके लिये पहली है!
शंकर: पहली है. इसलिए कि उससे नया वज़न बनता है, नया रिदम बनता है, नया ढंग हो जाता है. और उसमें लिखने वाले को भी एक याने लय और स्टाइल अलग हो जाता है. तो उससे क्या होता है कि समझो, राइटर जो है, या दादरा होता है या रूपक होता है या कहरवा, ये तीन ही चीज़ें होती हैं उनके लिए. तो उसपे लिखने के बाद यदि हम गाना लें तो वज़न तो एक जैसे ही आयेगा. उसमें बदलने में बड़ी तकलीफ होती है.
तबस्सुम: वैरायटी कम मिलेगी!
शंकर: जी हां. तो इसलिए जैसे मात्रे हैं ता-ता-ता, त-ता-तिक-ता, ता-ता. तो ये वज़न राइटर को कैसे आयेगा? तो ये रिदम जो है इसपे जो बोल आने से ज़रूर है कि वो गाना अलग हो जायेगा. इसीलिए हम लोगों को आदत हो गई है कि वज़न पे गाना लिखना. लेकिन लिखने में बड़ी तकलीफ होती है. क्योंकि शायर सोचता है कि इसमें कैसे लायें हम बोल. इसमें रिदम टूटता है, ये बिचारे उनको बड़ी परेशानी होती है.
तबस्सुम: अच्छा शंकरजी, क्या आप यह नहीं मानते कि शायर को इतनी फ्रीडम दी जाए कि वो मीटर पे न लिखे, पहले गाना लिखे तो उसके थॉट्स की उड़ान कुछ ज़्यादा ऊंची होगी?
शंकर: लेकिन वो मीटर जो है, लोगों तक पहुंचता नहीं है फिर. लोग याद नहीं करते उसे. जैसे, वैसे बहुत से हमारे गाने, कम-से-कम 100 गानों में से 75 गाने जो हैं, रिदम पे लिखे हुए हैं, वज़न पे.
तबस्सुम: यानि लोगों की तारीफ़ हो जाती है लेकिन गाना ज़बान पर चढ़ता नहीं है.
शंकर: चढ़ता नहीं है.
COURTESY: D.V.Shastry
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